तुम और जपला

जब भी मैं तुम्हारी ओर देखता हूँ
तुम्हे पाता हूँ जपला की गलियों में
उठा था सुबह, गुलाबी सी ठण्ड थी
पीपल के पेड़ के नीचे, सुखी पत्तियों के अलाव में ठण्ड को जलते हुए देखता हूँ

बाजार के मंदिर में
भगवान शिव के ऊपर पड़ते हुए दूध में पानी मिला होता था
९ साल का मैं , ७ की तुम — नजरों में मिलावट सीखी नहीं थी
धूल में खेलते हुए फूल को देखता हूँ
भविष्य को वर्तमान में देखता हूँ

आज भी याद है जब गया था सोन नदी में नहाने ठन्डे पानी ने छुआ ऐसे जैसे तुम्हारे होने का अहसास करा रही हो
खरबूजा तुम्हारे छोटे छोटे पाँवो के नजदीक से गुजरने की दास्तां कह रहा था
मुझे महसूस होता है तुम मुझमें ही हो … मुझसे ही बनी हो
मैं तुममे दुनिया और दुनिया में तुम्हे देखता हूँ

--

--

CTO at foodmarkethub.com/ building konfirmity

Love podcasts or audiobooks? Learn on the go with our new app.

Get the Medium app

A button that says 'Download on the App Store', and if clicked it will lead you to the iOS App store
A button that says 'Get it on, Google Play', and if clicked it will lead you to the Google Play store