आलोक समुन्दर के किनारे बैठा शून्य में देख रहा था, सुबह के ६ बजे थे। सूरज भगवान अभी तक जगे नहीं थे , चिड़ियों का चहचहाना शुरू हो गया था ।समुन्दर की लहरें उसके मन की तरह उथल पुथल कर रही थी।

क्या नहीं था उसके पास । एक समझदार बीवी, २ फूल जैसे सुशिल बच्चे, एक अच्छी सी नौकरी और एक मकान जिसे वो घर कह सकता था। अगर एक कमी थी तो बस इतनी की, दिल में टीसती सी एक भूली बिसरि याद मीरा की।

मीरा स्कूल मे पढ़ा करती थी उसके साथ, शायद पसंद भी करती थी आलोक को ।आलोक के पिताजी का ट्रांसफर हो गया कानपूर से आगरा और सारी ख्वाहिशें और सपने दफ़न हो गए उस ट्रक के नीचे जिसमे घर का सामान निकला था कानपूर से।

ऐसा नहीं था की वह खुश नहीं था अपनी जिंदगी से।आश्था से शादी जब बैंक की नौकरी की तयारी कर रहा था तब ही हो गयी थी , बाबा को उसका रबिन्द्र संगीत बड़ा अच्छा लगा था और मां को उसके बनाये हुए आलू की टिक्की। आलोक को उसने अपने सपने बताये थे और कर्नाटिक फ्यूज़न गाने भी सुनाये थे ; क्या गाती थी , क्या मधुर आवाज़ थी ,,,एक भूली हुई सी खनक भी थी। आलोक को यादों की दुनिया से सीधा यथार्थ की दुनिया में लायी थी। प्यार से कम नहीं था , कैसे शादी के १३ साल निकल गए पता ही नहीं चला । फिर आयी वह रात जब आश्था को नजर आया वोः काला सा तिल और उसकी मंझली ऊँगली वहीँ टिक गयी थी …..स्कूल के हाफ बांहों वाले शर्ट के बाहर ही दीखता था वो, और मीरा अक्सर छूती थी वहीं पर।

अच्छी खासी दुनिया चल रही थी, उस दिन से थोड़ी हिल सी गयी थी।पत्नी ने पूछा भी था कहाँ खोये हुवे रहते हो पर उसने बोला छोडो भी, तुम्हे क्या? ऐसा रूखापन नया था, पहली बार आश्था को भी थोड़ा अंजना सा लगा।उस रात आस्था ने बोला भी तुम्हे कोई टेंशन है तो कोई बात नहीं , पर गुस्सा तो मत ही करो। कैसा अपराधबोध हुआ था आस्था के शांत स्वाभाव से, पर रूखापन रुका नहीं, बढ़ता गया समय के साथ ।

रविवार का सूर्य चढ़ आया था, मोनिका और अभिनव ड्राइंग रूम में पेंटिंग कर रहे थे की आश्था की आवाज आयी …..सुनते हो, तुम्हे आज सिन्हा साहब को पार्टी में भी जाना है और लंच पार्टी है तो शाम को ना जाना। आज मेरी किटी पार्टी है और हमारे घर पर ही है तो मैं नहीं आ सकती। मैंने तुम्हारे कपडे निकल के रख दिए हैं, जल्दी से फ्रेश हो जाओ और मैं नाश्ता लगाती हूँ । सिन्हा साहब मतलब मेरे बॉस ……जाना ही पड़ेगा, उन्होंने नया घर बनाया था और अब बारी थी उसे सबको दिखाने की।अच्छी बात यह थी की काफी सारे लोग होंगे वहां पर, तो भीड़ में खोना आसान होगा और नए लोगों से जान पहचान भी हो जाएगी ।

कार चला रहा था आलोक , स्टीरियो से गाना बज रहा था ……
टूटी चारपाई वही
ठंडी पुरवाई रास्ता देखे
दूधों की मलाई वही
मिटटी की सुराही रास्ता देखे …

सिन्हा जी के घर पर पहुंचा तो मेला जम चूका था , कबीर जो घनिष्ठ मित्र था उसके साथ लग लिया और बना लिया एक ग्रुप, बातें ही तो होती हैं जब रविवार की दुपहर मिल बैठते हैं काफी सारे यार और बियर की बोतले।

अचानक आलोक की नजरें पड़ी एक औरत पर जो डांस फ्लोर पर थी थोड़ा जाना पहचाना सा चेहरा लगा…….. मीरा जैसी लग रही थी। थोड़ा और नजदीक जाके देखा तो मीरा ही थी, पहचान नहीं आ रही थी …. मोटी हो गई थी, मेकअप की ३-४ परतें तो थी उसके चेहरे पर, हाँथ में व्हिस्की का गिलास था, खा रही थी और थोड़ा खाना गिर भी रहा था उसके मुंह से। दूर से उसे देख कर आलोक यही सोच रहा था, क्या इसकेलिए वो आश्था को इग्नोर कर रहा था , अपने परिवार को भी। कब निकला सिन्हा जी के यहाँ से और कब थी आश्था उसके बाँहों में …. पता ही नहीं चला। माफ़ी मांगना चाहता था, जिन दिनों और पलों में प्यार नहीं कर पाया था …..करना चाहता था ।

बारिश की पानी में बैठा हुआ
एक मृग था द्वन्द में, पानी के इंतज़ार में
मालूम था उसे मरुस्थल है , मरीचिका है
निरंतर अपरिचित मृग तृष्णा ही तो उसका भाग्य है